गड़गड़ाते हुएबादलपेड़ तक, घर तक ।हवा को भेजतेदर-दर ।
वैसे तो सीमा नहीं दृष्टि की लेकिन जो ऊपर है और जो नीचे है- यहाँ ऎन सामने हम पर कुछ बरसाता-सरसाता, उससे एक अलग ही नाता है।
प्रयाग शुक्ल की रचनाओ से साभार ....