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Monday, May 10, 2010

महा कुम्भ २०१०, हरिद्वार




एक विहंगम दृश्य

Wednesday, December 30, 2009

हँसती हुई लड़की में
दौड़ते हुए लड़के में ।
फूलों में, घास में
झुर्रियों में ।
धूप में । चांदनी में ।

लहरों में, करवटों में--
हवा की ।
बादलों में ।
उछालों में
पर्वतों की ।

दहाड़ में समुद्र की ।
गलियों में । पाँत में पेड़ों की ।
स्त्रियों की आँखों में ।
पाँखों में चिड़ियों की ।

जीवन । जीवन ।
इतना जीवन ।



जिन्दगी हर जगह, पड़ाव दुबे पुल के नीचे.


परत दर परत उधड़ता आदमी, सिनेमा के पुराने पोस्टर की तरह.





Wednesday, September 2, 2009

रोज उठने बैठने की साथ में मजबूरिया,

वरना कोई कम नहीं है दोस्ती की मुश्किलें .

Saturday, August 29, 2009


चांद चढ़ रहा है
आकाश में--
इस शहर में ।
रिक्शों की घंटियाँ,
भोंपू गाड़ियों के,
तितर-बितर आवाज़ें ।

..........................

चढ़ रहा है चांद,
एक दूसरे शहर में ।