वैसे तो सीमा नहीं दृष्टि की लेकिन जो ऊपर है और जो नीचे है- यहाँ ऎन सामने हम पर कुछ बरसाता-सरसाता, उससे एक अलग ही नाता है।
प्रयाग शुक्ल की रचनाओ से साभार ....
अभी चली जाएगी शाम यहनिकट अंधेरे के ।बुझते प्रकाश में--मोरों का बोलनामंडराना चिड़ियों कापत्तियों का हिलनासिमटना आकाश का ।साथ वही, देखो फिरअनलिखा !
चांद चढ़ रहा हैआकाश में--इस शहर में ।रिक्शों की घंटियाँ,भोंपू गाड़ियों के,तितर-बितर आवाज़ें ।
..........................चढ़ रहा है चांद,एक दूसरे शहर में ।
और वो शुरुआत नाश्ते के साथ .................................